आरटीआई छूट पर यू-टर्न: कानून-व्यवस्था विभाग को फिर सूचना के अधिकार के दायरे में लाया

सहयोगी दलों और पारदर्शिता कार्यकर्ताओं की आपत्ति के बाद तमिलनाडु सरकार ने वापस लिया 21 सितंबर का आदेश

चेन्नई। तमिलनाडु सरकार ने सार्वजनिक (कानून एवं व्यवस्था) विभाग को सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम से छूट देने वाला अपना आदेश वापस ले लिया है। 21 सितंबर 2026 को जारी शासनादेश के तहत विभाग को आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के दायरे में लाकर खुफिया एवं सुरक्षा संगठन के रूप में अधिसूचित किया गया था। आदेश सामने आने के बाद सहयोगी दलों, सांसदों और पारदर्शिता के लिए काम करने वाले संगठनों की ओर से सवाल उठाए गए। इसके बाद सरकार ने रविवार को आदेश निरस्त कर दिया।

खास बातें
21 सितंबर का आदेश वापस: कानून एवं व्यवस्था विभाग को आरटीआई से छूट देने वाला शासनादेश रद्द।
धारा 24(4) का था आधार: विभाग को राज्य सरकार के खुफिया एवं सुरक्षा संगठन के रूप में अधिसूचित किया गया था।
कई अहम रिकॉर्ड दायरे में: पुलिस कार्रवाई, हिरासत में मौत, मानवाधिकार शिकायतें और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े मामले विभाग देखता है।
सहयोगी दलों ने भी जताई आपत्ति: मूल आदेश पर सरकार के समर्थन वाले राजनीतिक दलों की ओर से भी सवाल उठे।
आरटीआई में छूट पूर्ण नहीं: भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों के लिए अधिनियम में अलग प्रावधान मौजूद हैं।
सार्वजनिक होने के बाद बढ़ा विवाद

सरकार का आदेश रविवार सुबह सार्वजनिक हुआ, जिसके बाद इस पर तत्काल प्रतिक्रिया सामने आई। सीपीआई(एम) सांसद सु. वेंकटेशन समेत कई लोगों ने विभाग को आरटीआई से बाहर रखने के फैसले पर सवाल उठाए। इसके बाद सरकार ने अपने पूर्व आदेश को वापस ले लिया।

कानून-व्यवस्था विभाग क्यों है महत्वपूर्ण?

कानून एवं व्यवस्था विभाग का काम केवल खुफिया सूचनाओं और सुरक्षा संबंधी मामलों तक सीमित नहीं है। विभाग पुलिस हिरासत में मौत, पुलिस प्रताड़ना के आरोप, रिमांड कैदियों की मौत और पुलिस फायरिंग से संबंधित जांच रिपोर्टों को भी देखता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से जुड़े मामलों पर कार्रवाई भी इसके कार्यक्षेत्र में आती है।

इसके अलावा सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष, राजनीतिक आंदोलन, छात्रों और कृषि मजदूरों से जुड़े आंदोलन तथा इनसे संबंधित मामलों को वापस लेने के अनुरोध भी विभाग के कामकाज का हिस्सा हैं।

पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल

मूल आदेश के बाद तमिलनाडु के भ्रष्टाचार विरोधी संगठन अरप्पोर इयक्कम ने भी आपत्ति जताई थी। संगठन ने सवाल उठाया था कि सार्वजनिक विभाग की कानून एवं व्यवस्था शाखा के पास मौजूद सभी सूचनाओं को खुफिया जानकारी की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है। संगठन ने सरकार से आदेश वापस लेने की मांग की थी।

वीसीके अध्यक्ष और सांसद थोल थिरुमावलवन ने भी मूल फैसले पर चिंता जताते हुए सरकार से इसे वापस लेने की मांग की थी। उनके अनुसार इससे मानवाधिकारों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है।

आरटीआई की धारा 24 में क्या है प्रावधान?

आरटीआई अधिनियम की धारा 24 के तहत सरकार द्वारा अधिसूचित खुफिया और सुरक्षा संगठनों को सामान्य तौर पर सूचना के अधिकार से छूट दी जा सकती है। हालांकि यह छूट पूर्ण नहीं है। अधिनियम भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित आरोपों की जानकारी के संबंध में विशेष प्रावधान करता है।

विभाग के दायरे में निवारक हिरासत भी

कानून एवं व्यवस्था विभाग COFEPOSA और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत निवारक हिरासत से जुड़े मामलों को भी देखता है। हिरासत में लिए गए लोगों के अभ्यावेदन तथा उनके या उनकी ओर से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं से जुड़े मामलों पर भी विभाग कार्रवाई करता है।

विभाग कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठकें आयोजित करने, सांप्रदायिक घटनाओं से संबंधित रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजने और संसद में पूछे गए सवालों के जवाब तैयार करने जैसे कार्य भी करता है। इसके अलावा कथित मानहानिकारक लेखों, समाचार रिपोर्टों और भाषणों के संबंध में अभियोजन की मंजूरी से जुड़े प्रस्ताव भी विभाग के पास आते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Latest