पिछड़ा से पंडित तक: यूपी की सियासत में PDA बना बदलते समीकरणों का नया कोड

अखिलेश यादव के ‘पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक’ फॉर्मूले का लगातार विस्तार, विरोधियों ने भी गढ़े नए अर्थ; 2027 से पहले सामाजिक गठबंधन की सियासत में PDA बना चर्चा का केंद्र

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन अक्षरों का एक संक्षिप्त नाम इन दिनों लगातार नए अर्थ हासिल कर रहा है—PDA। जून 2023 में समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे “पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक” के सामाजिक गठबंधन के रूप में सामने रखा था। इसके बाद यह सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं रहा, बल्कि उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक पहुंच की बहस का प्रमुख हिस्सा बन गया।

अखिलेश यादव ने PDA के जरिए सपा के पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलितों और विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश की। समय के साथ इस फॉर्मूले में नए सामाजिक समूहों को जोड़ने की कवायद भी दिखाई दी। अक्टूबर 2023 में “A” के तहत अगड़े, आदिवासी और आधी आबादी को शामिल करने की बात कही गई। बाद में पत्रकारों को भी इस राजनीतिक फॉर्मूले से जोड़ने की व्याख्या सामने आई।

2024 के चुनाव ने बढ़ाई PDA की चर्चा

PDA की चर्चा 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान और तेज हुई। सपा ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 33 सीटों पर रही। इसके बाद PDA को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति और प्रतिक्रियाएं दोनों तेज हुईं।

हालांकि, PDA की कहानी यहीं नहीं रुकी। 2026 में अखिलेश यादव ने इस संक्षिप्त नाम को अलग-अलग सामाजिक संदर्भों में फिर से परिभाषित किया। मार्च में उन्होंने इसे “पीड़ित, दुखी और अपमानित” लोगों को जोड़ने वाले आंदोलन के रूप में बताया। अगस्त में ब्राह्मण सम्मेलन के दौरान उन्होंने PDA में “P” को “पंडित” से भी जोड़ने की बात कही। यह सपा की ब्राह्मण समुदाय तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में सामने आया।

सितंबर में रायबरेली की PDA रथ यात्रा के दौरान अखिलेश ने अल्पसंख्यक की परिभाषा में मुस्लिम, पारसी, बौद्ध और सिख समुदायों के साथ “आधी आबादी” को भी शामिल किया। इसी दौर में सपा ने PDA को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में फिर प्रमुखता से आगे बढ़ाया है। अक्टूबर से प्रस्तावित “समाजवादी PDA यात्रा” में भी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले को केंद्र में रखा गया है।

भाजपा और सहयोगी दलों ने भी बदला PDA का मतलब

PDA की बदलती व्याख्याओं ने भाजपा और उसके सहयोगी दलों को भी सपा पर हमला करने का राजनीतिक आधार दिया। भाजपा नेताओं ने समय-समय पर PDA के अलग-अलग अर्थ बताते हुए इसे परिवारवाद, अपराध और राजनीतिक हितों से जोड़कर निशाना साधा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2024 में PDA को “Production House of Dangai and Apradhi” की व्याख्या के साथ सपा पर हमला किया था। बाद में भाजपा के अन्य नेताओं ने “Private Development Authority”, “Parivar Development Agency” और “Paraya Dhan Apna” जैसे अलग-अलग अर्थों का इस्तेमाल किया।

भाजपा के अलावा एनडीए सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने भी PDA को लेकर अलग-अलग व्यंग्यात्मक अर्थ सामने रखे हैं। वहीं बसपा अध्यक्ष मायावती ने PDA की बदलती व्याख्याओं पर सवाल उठाते हुए सपा से इसका स्पष्ट अर्थ बताने की मांग की है।

PDA अब सिर्फ एक संक्षिप्त नाम नहीं

PDA की पूरी यात्रा पर नजर डालें तो 2023 में इसका मूल अर्थ पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक था। इसके बाद इसमें अगड़े, आदिवासी, महिलाएं और अन्य सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश हुई। 2026 में “पंडित” और “पीड़ित, दुखी, अपमानित” जैसी व्याख्याएं सामने आईं। दूसरी ओर भाजपा और उसके सहयोगियों ने इसी तीन अक्षरों को लेकर अपने राजनीतिक अर्थ गढ़े।

इस तरह उत्तर प्रदेश की राजनीति में PDA अब केवल एक संक्षिप्त नाम नहीं, बल्कि सामाजिक गठबंधन, राजनीतिक पहुंच और अलग-अलग दलों के चुनावी नैरेटिव की प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन चुका है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इसके और कितने अर्थ सामने आते हैं, यह भी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है।

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